Friday, December 18, 2015

हर मंदीर मे तेरी मुरत नही अगर तु खुद वहा मौजुद होता.....

तु है यह मानता हु मै, पर काश धरती पे तेरा भी कोई घर होता,
हर मंदीर मे तेरी मुरत नही अगर तु खुद वहा मौजुद होता,

जब जी करता मिलने आया करते हम,
शायद ही कोई मुश्किल होती ओर शायद ही कोई गम होता,

जनम्‌ लेने की खुशी होती पर जाने का कोई गम ना होता,
कैसा स्वर्ग ओर कैसा नर्क, हमारा ठीकाना जो यही किसी मंदीर मे होता,

कतारे लगती मंदीर के आगे, सब लोगो की इच्छाये भी पुरी होती,
फर्क बस इतना होता की, मंदीरो मे पैसो की बौछार ना होती,

"खुदा" ओर "इंसान" ये दो ही शब्द अगर हमे पता होते,
कैसी "जात" ओर कैसा "धर्म", काश ये बटवारा ना होता,

अच्छा लगा सोच कर, ऐसी अगर जिंदगी होती,
अगर होती कोई गलती हमसे, तु खुद हमे सजा सुनाता,

सब कुछ तेरा ही बनाया है, बस तेरी कमी का ऐहसास ना होता,
हर मंदीर मे तेरी मुरत नही अगर तु खुद वहा मौजुद होता.....

साल नया पर ख्वाब वही . . .

चलो मुबारक बात दे नये साल के तोंफे कि, उम्मीद नयी लेकर हम करे बात पुराने ख्वाबो कि. . . नही हुआ है पुर्न  लेकीन ख्वाब मेरा वो आज भी ...