Saturday, October 24, 2015

आज “मौका” भी है ओर “काबीलियत” भी.....

“अकल” तो हम सभी मे है, है अगर थोडी “चाहत” भी,  तो वापस बुलालो हर बिगडे हुये रिश्तो को,
क्युकी मेलो” मे बिछडने की हो या परदेस” मे मिलने की, सच्ची है सभी कहानीया ये बस “फिल्मो” की,
   
“रोना” हम सभी को है कभी ना कभी,  क्युकी उसके बगेर जिंदगी भी तो “अधुरी” है,
लेकीन इसका कारन सिर्फ “दर्द” ही क्यु ?, लोगो को हमने “खुशी” से भी तो रोते हुये देखा है,

कुछ करना हो “बडा” तो धुंडना होगा “हालातो” मे, हर बात का “दुसरा पैलु” वही होता है,
पर धुंड सके उसे तो कुछ “बात” है, वरना “सिधी” सी जिंदगी तो हम सभी को मुबारक वैसे भी है

न जाने कितने ही “लोग” आते है अपने जिवन मे, कुछ “कारण” उन सभी का होता है,
कोई आते ही “जवाब” देते है तो कोई जाते वक्त जवाब “छोड” जाते है,

आज “मौका” भी है ओर “काबीलियत” भी, कर पायेंगे हर वो बात जो सोची थी कभी,
काबील शायद “कल” भी होंगे हम,  पर क्या उस वक्त मोका भी रहेगा हमारा “साथी” ?,  

“देर” से ही सही पर वो “सब” करीयेगा जरूर,  थोडी “घबराहट” जिसकी होती है,
कुछ “सही” होगा तो कुछ “गलत” होगा, पर जिंदगी “अच्छी” शायद ऐसी हि होती है,

क्युकी ना “आपको आपका” पता है, ना “मुझे मेरा” पता है,
“कल” की छोडो पर अगले “मिनट” मे क्या “किस्मत” मे “लिखा” है.....

साल नया पर ख्वाब वही . . .

चलो मुबारक बात दे नये साल के तोंफे कि, उम्मीद नयी लेकर हम करे बात पुराने ख्वाबो कि. . . नही हुआ है पुर्न  लेकीन ख्वाब मेरा वो आज भी ...