Thursday, July 9, 2015

और मेरा कोन यहा......

जब सोचता हु कारण मेरे यहा आने का, खुदा तब तेरी चालाखी का पता लगता है, अपना बोझ मा-पिता को सोप तु खुद आजाद हो गया.

मै अंजान था यहा, इन दोनो ने ही मुझे अपना बना लिया, रिश्तो की ऐह्मीयत इन्हीसे ली, उन्हे थोडा निभाना भी सिख़ लिया.

बडा हुआ मै ये भी इन्हीसे पता चला, कंधो पर मेरे जब कुछ महसुस होने लगा, आसान लगा था पहले जो, बदलना अब उसने भी शुरु कीया था.

अब जा के थोडा मै संभलेने लगा ही था, की कूछ और लोग मिल गये, वक्त ये कुछ अजीब सा लग रहा था, अपनो से दुर होने का डर नजाने क्यु लग रहा था.

कीसीसे पुछा तो सभीने मै तेरा और वो पराया बस यही कहा था, पहली बार अब मैने अपना और पराया सा कुछ  पाया था. लोगो की इस भीड मे मै जैसे खुद से ही दुर जा रहा था.   

भरोसा मेरा तो सिर्फ मा-पिता पर ही था, करोडो की बस्ती मे पहला साथ जो उन का मिला था, ये सवाल भी फीर उन्हीसे पुछ लिया, जवाब मिला पर कुछ अलग था वो जिसे अब मुझे समझना था.


सवाल वही पर साथ मे “क्यो ?” ये उन सभी से पुछने को कहा था. अब जा कर “और मेरा कोन यहा ?” इसका जवाब मुझे मिलने लगा था. अपने बनने लगे और रिश्ते संभलने लगे थे, शुरवात जिनके साथ हुइ आगे बढना भी उन्हीसे सिख लिया था.

साल नया पर ख्वाब वही . . .

चलो मुबारक बात दे नये साल के तोंफे कि, उम्मीद नयी लेकर हम करे बात पुराने ख्वाबो कि. . . नही हुआ है पुर्न  लेकीन ख्वाब मेरा वो आज भी ...